दुनिया से विदा होकर भी दुनिया देखेगी 9 साल की मिशा, जाते-जाते किसी की जिंदगी में भर गई रोशनी
धनबाद: कुछ लोग दुनिया से विदा होकर भी इस दुनिया में अपनी मौजूदगी छोड़ जाते हैं। उनकी यादें ही नहीं, उनके किए गए नेक काम भी उन्हें हमेशा जिंदा रखते हैं। नौ साल की नन्ही मिशा भी अब भले इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन उसकी आंखों से कोई दूसरा इंसान दुनिया की खूबसूरती देख सकेगा। थैलेसीमिया की पीड़ा से जूझते हुए जिंदगी की जंग हार गई मिशा जाते-जाते किसी की जिंदगी में रोशनी भर गई। बेटी को खोने के असहनीय दुख के बीच उसकी मां सविता देवी ने नेत्रदान का फैसला लेकर इंसानियत की एक ऐसी मिसाल पेश की, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। धनबाद स्थित शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में गुरुवार दोपहर करीब दो बजे थैलेसीमिया से पीड़ित नौ वर्षीय मिशा को गंभीर हालत में भर्ती कराया गया। उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने तत्काल उसे पीआईसीयू में शिफ्ट किया। लेकिन कुछ ही देर बाद कार्डियक अरेस्ट के कारण मासूम ने दम तोड़ दिया। बताया गया कि मिशा को 3 नवंबर को ही खून चढ़ाया गया था और इसके बाद वह घर गई थी। गुरुवार को उसकी तबीयत फिर बिगड़ गई। बच्ची की मां सविता देवी ने सामाजिक कार्यकर्ता को फोन कर उसकी हालत की जानकारी दी। इसके बाद मिशा को अस्पताल बुलाकर भर्ती कराया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। मिशा की मौत के बाद उसकी मां सविता देवी के सामने ऐसा फैसला लेने का अवसर आया, जो गहरे दुख के बीच भी दूसरों के जीवन में उम्मीद जगा सकता था। उन्हें नेत्रदान के लिए प्रेरित किया गया तो उन्होंने अपनी सहमति दे दी। सविता देवी ने भावुक होकर कहा कि अब तक उनकी बेटी को लोग रक्तदान कर जीवन देने की कोशिश करते रहे। आज उनकी बेटी नेत्रदान कर किसी दूसरे इंसान की जिंदगी रोशन करेगी। इससे उनकी बच्ची अमर हो जाएगी। एक मां के लिए अपनी नौ साल की बेटी को खोने का दुख शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। लेकिन इस पीड़ा के बीच सविता देवी ने जो निर्णय लिया, वह दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया। मिशा के नेत्रदान की प्रक्रिया में अस्पताल के नेत्र विभाग की टीम ने सहयोग किया। इसमें डॉ. धर्मेंद्र कुमार, अशोक, मनोज और संदीप की भूमिका रही। नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पीडियाट्रिक्स विभाग में मौजूद वार्ड बॉय, नर्स और पैरामेडिकल विद्यार्थियों ने मासूम मिशा को सलामी देकर श्रद्धांजलि दी। इस भावुक क्षण ने अस्पताल में मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया। जिस बच्ची को बचाने की कोशिश की जा रही थी, उसके जाने के बाद भी उसकी आंखें किसी दूसरे के जीवन में उजाला लाने की उम्मीद बन गईं। मिशा से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे उनके जीवन का अहम हिस्सा हैं। मिशा के जाने का दुख बेहद गहरा है। उन्होंने बताया कि दो दिन पहले ही बच्ची से उनकी बातचीत हुई थी, लेकिन आज वह दुनिया में नहीं रही। इसके बावजूद उसकी मां ने जिस हिम्मत के साथ नेत्रदान का फैसला लिया, वह सलाम के योग्य है। मिशा के शव को उसके पिता के घर ले जाने के लिए धनबाद के उपायुक्त आदित्य रंजन ने एंबुलेंस की व्यवस्था कराई। इसके लिए बच्ची से जुड़े लोगों ने उपायुक्त के प्रति आभार जताया। नन्ही मिशा की जिंदगी भले नौ साल में थम गई, लेकिन उसका नेत्रदान एक नई उम्मीद छोड़ गया है। वह खुद थैलेसीमिया की तकलीफ सहते हुए दुनिया से विदा हो गई, मगर उसकी आंखों से कोई दूसरा इंसान इस दुनिया को देख सकेगा। शायद यही किसी के जीवन को अमर बनाने का सबसे खूबसूरत अर्थ है।बेटी की मौत के बाद मां ने लिया बड़ा फैसला
'आज मेरी बच्ची नेत्रदान कर किसी को जीवन देगी'
मेडिकल कॉलेज की टीम ने निभाई अहम भूमिका
मिशा को खोने का गम, लेकिन उसके फैसले पर गर्व
उपायुक्त ने शव ले जाने के लिए उपलब्ध कराई एंबुलेंस















