मुस्कुराइये आप हजारीबाग में हैं।लेकिन क्या सचमुच मुस्कुराने की कोई वजह है जब सड़क नहीं हो पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं हो शौचालय के लिए आज भी जंगल जाना पड़े और विकास सिर्फ सरकारी फाइलों में दिखाई दे तब मुस्कुराना शायद मजबूरी बन जाता है।आज हम आपको हजारीबाग के ऐसे गांवों की तस्वीर दिखाएंगे जहां दशकों बाद भी विकास की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है। यह उन लोगों की कहानी है जिनकी आवाज शायद व्यवस्था तक कभी नहीं पहुंची।हजारीबाग से हमारी यात्रा शुरू होती है बड़कागांव प्रखंड की ओर। जिला मुख्यालय से महज 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित क्षेत्र तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं।जिस गांव की ओर हम बढ़ रहे हैं वहां तक जाने के लिए सड़क तो है लेकिन उसकी हालत इतनी खराब है कि हमारे साथ चल रही चार पहिया गाड़ी करीब छह किलोमीटर पहले ही रुक जाती है। आगे सिर्फ उबड़ खाबड़ रास्ता बड़े बड़े पत्थर और धूल भरी पगडंडियां हैं।यह वही क्षेत्र है जो सदर विधानसभा और बड़कागांव विधानसभा को जोड़ता है। सवाल यह है कि जब मुख्य मार्गों की यह स्थिति है तो गांवों का हाल कैसा होगा कई किलोमीटर की कठिन यात्रा के बाद हम पहुंचते हैं बड़कागांव प्रखंड के चंदौल पंचायत स्थित आमझरी गांव।घने जंगलों के बीच बसे इस गांव में लगभग 250 से 300 लोग रहते हैं। यहां तक पहुंचने का रास्ता किसी परीक्षा से कम नहीं। कहीं बोल्डर कहीं बालू कहीं संकरी पगडंडी।ग्रामीण महिलाओं से बातचीत में पता चलता है कि यहां सड़क शुद्ध पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी सपना हैं।ग्रामीण बताते हैं कि अगर किसी काम से हजारीबाग या बड़कागांव जाना हो तो आधे घंटे का सफर कई बार दो से तीन घंटे में पूरा होता है। पंचायत से लेकर प्रखंड कार्यालय तक कई बार शिकायतें की गईं लेकिन विकास की गाड़ी शायद इस गांव का रास्ता भूल गई।आमझरी से करीब एक किलोमीटर दूर है चौकियां गांव।यहां पहुंचने के लिए जंगलों के बीच से गुजरना पड़ता है। रास्ते में हमें एक तालाबनुमा गड्ढा दिखाई देता है, जहां महिलाएं बर्तन धो रही हैं और दूसरी तरफ बच्चे नहा रहे हैं।ग्रामीण बताते हैं कि यही पानी कभी-कभी पीने के काम भी आता है। पहले झरनों का पानी इस्तेमाल होता था लेकिन अब ग्रामीण खुद के बनाए कुओं और तालाबों पर निर्भर हैं।महिलाओं का कहना है कि चुनाव के समय नेता वोट मांगने जरूर आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर से व्यवस्था की नजरों से ओझल हो जाता है।सरकार पंचायत स्तर पर कैंप लगाने और गांव गांव योजनाएं पहुंचाने के दावे करती है।लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसे गांव प्रशासन और व्यवस्था की नजरों से कैसे छूट जाते हैं जहां आज भी शौचालय के लिए लोगों को जंगल जाना पड़ता है हमारे साथ इस क्षेत्र तक पहुंचे समाजसेवी सचिदानंद पांडे कहते हैं कि असली पत्रकारिता उन्हीं लोगों की आवाज उठाना है जिन्हें विकास की मुख्यधारा ने पीछे छोड़ दिया है।इस पूरे मामले को लेकर हमने हजारीबाग उपायुक्त से भी बात की। उपायुक्त ने आश्वासन दिया है कि ग्रामीणों की समस्याओं की जांच कर जल्द समाधान की दिशा में कार्रवाई की जाएगी।लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है. क्या विकास की योजनाएं इन जंगलों तक पहुंच पाएंगी क्या सड़क पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं इन गांवों की तकदीर बदल पाएंगी या फिर आमझरी और चौकियां जैसे गांव यूं ही विकास की प्रतीक्षा में समय गुजारते रहेंगे