हज़ारीबाग चुनाव की आहट में भी नहीं थमा अतिक्रमण
हज़ारीबाग नगर निगम चुनाव की तैयारियों और आचार संहिता लागू होने के बीच
हज़ारीबाग में एक बार फिर अतिक्रमण का शर्मनाक मामला सामने आया है। प्रशासन की
सतर्कता के दावों के बावजूद ज़मीनी हकीकत बिल्कुल उलट नज़र आ रही है।मामला वार्ड
नंबर 7 मटवारी स्थित
कृष्णापुरी तालाब की ज़मीन से जुड़ा है
जहां अतिक्रमणकारियों ने एक बार फिर
बेखौफ होकर कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया है। तालाब के किनारे की सरकारी ज़मीन जिसे जल संरक्षण और वार्ड विकास के लिए चिन्हित किया गया था आज धीरे धीरे
आलीशान मकानों गैराज
खटाल और अब दुकानों में तब्दील होती जा
रही है।स्थानीय लोगों के अनुसार
वर्षों पहले भी यहां अतिक्रमण हुआ था।
तब प्रशासन ने नोटिस जारी किए
कुछ दिखावटी कार्रवाई हुई लेकिन बाद में फाइलें बंद कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया
गया। इसी का नतीजा है कि अतिक्रमणकारियों का मनोबल लगातार बढ़ता गया।करीब चार साल
पहले मीडिया की सक्रियता के बाद यहां निर्माण कार्य पर रोक लगी थी और यह मामला
अखबारों की सुर्खियों में रहा
लेकिन यह रोक अस्थायी साबित हुई। अब एक
बार फिर बची खुची ज़मीन पर कब्ज़े की होड़ मच गई है। पहले मकान बने, अब खाली प्लॉट्स पर
दुकानों की नींव डाली जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह सब किसी न किसी
सरकारी अधिकारी की शह पर हो रहा है
वरना इतनी हिम्मत संभव नहीं।सवाल यह भी
उठ रहा है कि जिस ज़मीन पर चार साल पहले खुद प्रशासन ने अतिक्रमण के नाम पर रोक
लगा रखी थी वहां अचानक रातों-रात सफाई कर बीम डालने के लिए छड़ बांधने का
काम कैसे शुरू हो गया आखिर यह सब किसके संरक्षण में हो रहा है इतना ही नहीं इसी ज़मीन के पीछे एक और अतिक्रमण सामने आया है। वार्डवासियों
का कहना है कि जिस जगह पर वार्ड विकास केंद्र बनना था वहां आज नकुल मेहता
का गैराज और खटाल संचालित हो रहा है। तालाब की परिधि लगातार संकरी की जा रही है और
बड़े बड़े भवन खड़े किए जा रहे हैं जिससे जलस्रोत का
अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।कृष्णापुरी क्षेत्र के छोटे-छोटे प्लॉट्स जिनकी कीमत लाखों में है उन्हें सुरक्षित करने
के लिए स्थानीय लोगों ने पहले भी जिला प्रशासन से घेराबंदी और पौधरोपण की मांग की
थी लेकिन हर बार यह मांग फाइलों में ही दम तोड़ती रही।अब सबसे
बड़ा सवाल यह है कि अगर आचार संहिता के दौरान भी प्रशासन आंख मूंदे रहा तो यह अतिक्रमण एक खतरनाक मिसाल बनेगा। फिर हर भू माफिया खुलेआम तालाब
सरकारी ज़मीन और सार्वजनिक संपत्ति पर
कब्ज़ा करेगा। चुनाव की तैयारी के बीच प्रशासन की यह चुप्पी क्या अतिक्रमणकारियों
के लिए खुला न्योता नहीं















