नई दिल्ली: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ (ONOE) व्यवस्था को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने विरोध जताया है। संसद की संयुक्त समिति के सामने अपनी बात रखते हुए चिदंबरम ने प्रस्तावित व्यवस्था को असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा कि निर्वाचित विधानसभाओं और संसद के कार्यकाल को कम करना संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होगा।

चिदंबरम को संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़े अन्य विधेयकों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के समक्ष अपनी राय रखने के लिए बुलाया गया था। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से स्वप्निल त्रिपाठी ने भी समिति के सामने अपनी प्रस्तुति दी।

‘मेरा जमीर समर्थन की इजाजत नहीं देता’

सूत्रों के मुताबिक, चिदंबरम ने समिति के सामने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से संबंधित प्रस्तावित विधेयक असंवैधानिक हैं। उनका तर्क था कि प्रत्येक विधानमंडल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और निर्वाचित सदनों का कार्यकाल कम करना संविधान की मूल संरचना से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है।

कांग्रेस नेता ने कथित तौर पर कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती। उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार के पास संविधान में इस तरह के बदलाव के लिए संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं है।

TMC नेता सागरिका घोष ने भी किया विरोध

समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नेता सागरिका घोष ने भी वन नेशन-वन इलेक्शन प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि प्रस्तावित व्यवस्था से निर्वाचन आयोग को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिल सकते हैं।

वहीं, पद्म पुरस्कार से सम्मानित करीब 10 लोगों के एक समूह ने भी समिति के सामने अपनी राय रखी। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार समेत अन्य लोग शामिल थे। कुछ सदस्यों ने एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई।

विधि सेंटर ने भी उठाए संवैधानिक सवाल

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने भी प्रस्तावित वन नेशन-वन इलेक्शन व्यवस्था में कई बदलाव और सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई। संस्था ने कहा कि मौजूदा प्रारूप को संवैधानिक कसौटी पर टिकाने के लिए इसमें पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान जोड़े जाने चाहिए।

संस्था ने प्रस्तावित अनुच्छेद 82A(3) को लेकर भी सवाल उठाया। इसके तहत चुनाव आयोग को एक साथ चुनाव लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव से जुड़ी भूमिका दिए जाने की बात है। संस्था के अनुसार, इससे संसद की संविधान संशोधन की शक्ति अप्रत्यक्ष रूप से किसी अन्य संस्था को दिए जाने का सवाल पैदा हो सकता है।

चुनाव टालने के नियम स्पष्ट करने का सुझाव

विधि सेंटर ने सुझाव दिया कि राज्य विधानसभा चुनावों को टालने के आधार स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाएं। साथ ही राष्ट्रपति शासन के दायरे को सीमित करने और राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई।

दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुए थे विधेयक

वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़े विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद इन्हें विस्तृत विचार-विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया।

इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य रहे हैं।