सिंधु जल संधि पर भारत का दो टूक जवाब- ‘अवैध’ कोर्ट का फैसला मंजूर नहीं, संधि अभी भी स्थगित
नई दिल्ली: सिंधु जल संधि को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना रुख बेहद स्पष्ट कर दिया है। अमेरिका स्थित भारतीय दूतावास ने कहा है कि तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का गठन ही सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन कर किया गया था। भारत ने इस संस्था को कभी मान्यता नहीं दी और न ही उसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया। ऐसे में उसके अंतरिम उपायों और संधि की स्थिति को लेकर दिए गए फैसलों का भारत पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। भारत ने कहा है कि सिंधु जल संधि से जुड़े संप्रभु फैसले लेने का अधिकार पूरी तरह भारत के पास है और नई दिल्ली की नजर में संधि फिलहाल ‘अबेयंस’ यानी स्थगित स्थिति में है। भारत की यह प्रतिक्रिया हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) के 31 अगस्त 2026 के फैसले के बाद आई है। कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी लागू है और भारत को संधि के तहत अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए। कोर्ट ने रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े निर्माण पर अंतरिम उपाय भी जारी किए। भारत ने इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जिस कोर्ट ने यह फैसला दिया है, उसका गठन ही संधि के प्रावधानों के खिलाफ हुआ है। इसलिए भारत उसके अधिकार क्षेत्र और फैसलों को स्वीकार नहीं करता। भारतीय पक्ष के मुताबिक, भारत ने इस तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को कभी मान्यता नहीं दी। भारत न तो इसकी कार्यवाही में शामिल हुआ और न ही इसके सामने अपना पक्ष रखा। नई दिल्ली का कहना है कि ऐसी स्थिति में इस संस्था की ओर से जारी आदेश या फैसले भारत के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने संप्रभु अधिकारों से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र है। भारत ने अप्रैल 2025 में सिंधु जल संधि को ‘अबेयंस’ में रखने का फैसला किया था। इसके बाद संधि की कानूनी स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे को लेकर विवाद और गहरा गया। हेग स्थित कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में भारत की इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया और संधि को प्रभावी बताया। इसके विपरीत भारत का कहना है कि इस फैसले का उसकी संप्रभु कार्रवाई और परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फैसले में जम्मू-कश्मीर की रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अंतरिम रोक संबंधी निर्देश भी दिए गए हैं। PCA के अनुसार, परियोजना से जुड़े कुछ हिस्सों पर आगे की कार्रवाई को विशेषज्ञ के आकलन तक सीमित रखने का आदेश दिया गया है। भारत हालांकि इस आदेश को भी मानने के लिए बाध्य नहीं मानता, क्योंकि उसका मूल तर्क यही है कि संबंधित कोर्ट का गठन ही वैध नहीं था। सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी और इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के पानी के इस्तेमाल और बंटवारे की व्यवस्था तय की गई थी। लंबे समय तक दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद यह संधि लागू रही, लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ते तनाव के कारण इसका भविष्य विवाद का बड़ा मुद्दा बन गया है। भारत के ताजा रुख से साफ है कि नई दिल्ली हेग स्थित इस कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने के मूड में नहीं है और सिंधु जल संधि से जुड़े अपने फैसलों को संप्रभु अधिकारों के तहत ही देखता है।हेग के फैसले के बाद भारत ने जताई कड़ी आपत्ति
भारत ने कहा- न कोर्ट को माना, न कार्यवाही में शामिल हुआ
सिंधु जल संधि फिलहाल ‘अबेयंस’ में
रतले परियोजना पर भी कोर्ट ने दिए अंतरिम निर्देश
भारत-पाकिस्तान के बीच पानी का विवाद फिर केंद्र में















