हजारीबाग हेसाकोचा आदिवासी टोला सड़क की कमी ग्रामीणों का श्रमदान
टाटीझरिया (हजारीबाग): विकास और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित हेसाकोचा आदिवासी टोले की तस्वीर ग्रामीण व्यवस्था की जमीनी हकीकत बयां कर रही है। यहां आज भी सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जब ग्रामीणों को राहत नहीं मिली, तो उन्होंने खुद ही हाथों में कोड़ी, फावड़ा, गैंता और सब्बल उठा लिया। पिछले पांच दिनों से ग्रामीण श्रमदान कर जंगल के बीच रास्ता दुरुस्त करने में जुटे हैं। हजारीबाग जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर बेडम पंचायत के इस सुदूरवर्ती टोले में लगभग 25 घर हैं, जिनमें करीब 250 लोग रहते हैं। मंगरपट्टा के बसरिया टोला मुख्य सड़क से हेसाकोचा की दूरी करीब पांच किलोमीटर है। पूरा रास्ता कच्चा और पथरीला है। बरसात के बाद इसकी स्थिति और खराब हो जाती है, जिससे ग्रामीणों का आवागमन मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की समस्या को लेकर वे कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से मिल चुके हैं। आवेदन देने और लगातार आग्रह करने के बावजूद उन्हें अब तक सिर्फ आश्वासन मिले। ग्रामीणों के मुताबिक, चुनाव के दौरान वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद उनकी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जाता। आखिरकार ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर रास्ता ठीक करने का फैसला लिया। मिहिलाल टुडू, बिनोद टुडू, मुनिया मरांडी, बहराम टुडू, सुनील हांसदा, लालजी मुरमू, रंजीत मुरमू, सुशील मुरमू, महेश टुडू, सलिया देवी, बासमती देवी, सुनीता मरांडी, शांति देवी, कीता मुरमू, रीना टुडू, रीमा टुडू, वलीसा हांसदा, प्रमील टुडू, आरती देवी, सावित्री हांसदा, छोटन हांसदा, धनेश हांसदा, मुनी हांसदा और जीतमुनि देवी समेत कई ग्रामीण इस काम में जुटे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि हर साल बरसात के मौसम के बाद उन्हें इसी तरह श्रमदान कर रास्ते को चलने लायक बनाना पड़ता है। हेसाकोचा की सबसे गंभीर समस्या स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने की है। गांव तक वाहन नहीं पहुंचने के कारण किसी व्यक्ति के गंभीर रूप से बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के लिए ग्रामीणों को खटिया का सहारा लेना पड़ता है। मरीज को खटिया पर लादकर करीब पांच किलोमीटर तक पथरीले और कच्चे रास्ते से मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है। इस दौरान चुआ नाला भी पार करना पड़ता है, जो ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि रास्ता दुरुस्त करने के बाद वे नाले पर लकड़ी का अस्थायी पुल बनाने की योजना बना रहे हैं, ताकि आवागमन कुछ आसान हो सके। खराब रास्ते और नाले में पानी रहने के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। ग्रामीणों के अनुसार, कई बार बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और उनकी शिक्षा बाधित होती है। गांव के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से कृषि, पशुधन और वनोत्पाद पर निर्भर है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की सुविधा नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक सेवाओं का लाभ भी उन तक आसानी से नहीं पहुंच पाता। ग्रामीणों के मुताबिक, हेसाकोचा के अलावा आसपास के छोरोडवा और टोंडा आदिवासी टोलों के लोगों को भी इस सड़क के निर्माण से राहत मिल सकती है। उन्होंने प्रशासन से जल्द पक्की सड़क बनाने की मांग की है। ग्रामीणों का सवाल है कि लगातार शिकायत और आवेदन देने के बावजूद अब तक सड़क निर्माण की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन उनकी समस्या पर ध्यान देगा, या फिर उन्हें हर साल खुद ही श्रमदान कर रास्ता दुरुस्त करना पड़ेगा? फिलहाल हेसाकोचा के ग्रामीण अपने श्रम से रास्ता बनाने में जुटे हैं, लेकिन उनकी मांग है कि अस्थायी मरम्मत के बजाय स्थायी सड़क का निर्माण कराया जाए।गुहार के बाद भी नहीं बनी सड़क, ग्रामीणों ने उठाए औजार
मरीजों और गर्भवती महिलाओं को खटिया पर ले जाने की मजबूरी
बच्चों की पढ़ाई और सरकारी योजनाएं भी प्रभावित
पक्की सड़क निर्माण की मांग














