भारतीय NGO ने संधि की समीक्षा की मांग उठाई, पानी की सुरक्षा और मानवाधिकारों को लेकर बहस तेज
नई दिल्ली : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद अब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) तक पहुंच गया है। 31 अगस्त 2026 को हेग स्थित Court of Arbitration ने कहा था कि 1960 की संधि लागू है और भारत को उसके तहत अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए। भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि संधि को “abeyance” में रखने का उसका फैसला कायम है। Court of Arbitration ने भारत के संधि को एकतरफा तौर पर रोकने के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने संधि को लागू बताते हुए भारत से उसके प्रावधानों का पालन करने को कहा और जम्मू-कश्मीर में रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अंतरिम रोक लगाने का निर्देश भी दिया। भारत के विदेश मंत्रालय ने इसके जवाब में कहा कि वह इस Court of Arbitration को मान्यता नहीं देता। मंत्रालय के अनुसार, भारत ने इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया है और अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार नहीं है। भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को “abeyance” में रखने का उसका फैसला प्रभावी है। 15 सितंबर 2026 को जिनेवा में UNHRC के 63वें सत्र के दौरान एक दिल्ली स्थित भारतीय NGO ने सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाई। यह बयान सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के मानवाधिकार पर विशेष रैपोर्टेयर के साथ संवाद के दौरान दिया गया। NGO ने कहा कि पानी तक पहुंच का संबंध जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, सम्मान और विकास जैसे अधिकारों से है। NGO का तर्क था कि 1960 में बनी संधि के बाद क्षेत्र की जल-सुरक्षा परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि सरकारें अपने मानवाधिकार संबंधी दायित्वों को पूरा कर सकें। इसमें सिंधु जल संधि की समीक्षा को जरूरी बताया गया। सिंधु जल प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों में भी सिंधु नदी प्रणाली को पाकिस्तान की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। पानी की उपलब्धता में गंभीर व्यवधान होने पर पीने के पानी, कृषि, स्वास्थ्य और आजीविका पर असर पड़ने की चिंता व्यक्त की गई है। हालांकि, मौजूदा घटनाक्रम से यह निष्कर्ष निकालना कि पाकिस्तान में निश्चित तौर पर सूखा पड़ने वाला है, अभी जल्दबाजी होगी। पानी के प्रवाह, मौसम, जलाशयों, कृषि जरूरतों और भारत की परियोजनाओं के वास्तविक संचालन जैसे कई कारक स्थिति को प्रभावित करते हैं। भारत ने अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को “abeyance” में रखने का फैसला किया था। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र के दस्तावेजों में भी इस फैसले और उससे जुड़े मानवाधिकार संबंधी सवालों का उल्लेख है। इस बीच, भारत ने जून 2026 में UNHRC में संधि को वर्तमान परिस्थितियों के लिहाज से पुराना बताया था। वहीं, पाकिस्तान और उसके पक्ष से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संधि के बने रहने और पानी के अधिकारों को लेकर अलग दावे रखे गए हैं। फिलहाल विवाद के दो प्रमुख पहलू हैं—भारत का Court of Arbitration के अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार करना और संधि को abeyance में बनाए रखना, तथा दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संधि और उससे जुड़े जल-अधिकारों को लेकर उठ रहे सवाल। आने वाले समय में इस विवाद का असर भारत-पाकिस्तान के जल सहयोग और क्षेत्रीय जल-सुरक्षा पर पड़ सकता है।हेग की कोर्ट के फैसले को भारत ने क्यों ठुकराया?
अब UNHRC में क्या उठा मामला?
पाकिस्तान के लिए पानी को लेकर चिंता क्यों?
भारत-पाकिस्तान के बीच आगे क्या?














