नई दिल्ली:  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस अब सोशल मीडिया तक पहुंच गई है। 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ और ‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ जैसे नामों से नए अकाउंट और डिजिटल कैंपेन चर्चा में आ गए हैं।

इनमें से एक इंस्टाग्राम अकाउंट के तेजी से लोकप्रिय होने की रिपोर्ट सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि अकाउंट ने महज 24 घंटे के भीतर लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए। हालांकि, अकाउंट के संचालक की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं है और इस डिजिटल कैंपेन के पीछे कौन है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

एक्स पर विपक्षी चेहरों को फॉलो करता है अकाउंट

सोशल मीडिया पर सामने आए @DNJP_India नाम के एक्स अकाउंट की गतिविधियां भी चर्चा में हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह हैंडल कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, यूट्यूबर ध्रुव राठी, कॉमेडियन कुणाल कामरा और अभिनेता प्रकाश राज समेत कई चर्चित चेहरों को फॉलो करता है।

बताया जा रहा है कि यह अकाउंट इसी महीने बनाया गया है। हालांकि, केवल किसी राजनीतिक नेता या सार्वजनिक व्यक्ति को फॉलो करने के आधार पर अकाउंट के राजनीतिक समर्थन या संचालन से जुड़ा कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

24 घंटे में तेजी से बढ़े फॉलोअर्स

‘दिमागी नक्सल पार्टी’ नाम से अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामने आए अकाउंट्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने का दावा किया जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अभियान शुरू होने के शुरुआती समय में ही इसे हजारों फॉलोअर्स मिल गए और इसके बाद इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ती गई।

कैंपेन से जुड़े अकाउंट की ओर से ‘सोचो, रिसर्च करो, विरोध करो’ जैसे संदेशों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि यह डिजिटल अभियान राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर सवाल उठाने तथा विरोध दर्ज कराने की भाषा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि, सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बदलती रहती है। इसलिए किसी एक समय पर दिखाई देने वाले आंकड़े को स्थायी संख्या नहीं माना जा सकता।

इसी महीने बनाया गया अकाउंट

इंस्टाग्राम पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ नाम वाला अकाउंट इसी महीने बनाया गया। अकाउंट के यूजरनेम में बदलाव किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इस पर कई पोस्ट मौजूद हैं और बड़ी संख्या में अन्य अकाउंट्स को फॉलो किया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल हालांकि यही है कि इस अकाउंट या पूरे डिजिटल कैंपेन का संचालन कौन कर रहा है। अकाउंट पर किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या आधिकारिक संगठन के बारे में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

PM मोदी के 15 अगस्त के भाषण के बाद शुरू हुई चर्चा

‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त 2026 के स्वतंत्रता दिवस भाषण के बाद तेज हुआ। लाल किले से संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए वैचारिक स्तर पर सक्रिय लोगों को लेकर भी चेतावनी दी और ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचानकर अलग-थलग करने की बात कही।

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद विपक्षी नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने तो इस टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। इस बयान के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई।

किरेन रिजिजू ने दी ‘दिमागी नक्सल’ की व्याख्या

विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने इसे ऐसे लोगों से जोड़कर बताया जो माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं और देश की संवैधानिक व्यवस्था या राष्ट्रीय एकता के खिलाफ खड़े होते हैं। इस बयान के बाद भी विपक्ष की ओर से प्रतिक्रियाएं जारी रहीं।

इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक नेताओं की व्याख्याएं सामने आने के साथ ही ‘दिमागी नक्सल’ शब्द अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसका इस्तेमाल व्यंग्य, राजनीतिक विरोध और डिजिटल कैंपेन के रूप में किया जाने लगा है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बाद नया डिजिटल प्रयोग?

सोशल मीडिया पर ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ के नाम से सामने आया यह अभियान राजनीतिक व्यंग्य के डिजिटल प्रयोगों की कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर राजनीतिक नामों और नारों के जरिए व्यंग्यात्मक कैंपेन चर्चा में आते रहे हैं।

फिलहाल इस नए कैंपेन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसके पीछे कौन है और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है। जब तक अकाउंट संचालक की पहचान या किसी संगठन की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आती, तब तक इसे एक सोशल मीडिया आधारित डिजिटल कैंपेन के रूप में ही देखा जाना उचित होगा।

प्रधानमंत्री के बयान और विपक्ष की प्रतिक्रियाओं के बीच यह नया सोशल मीडिया ट्रेंड आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस को किस दिशा में ले जाता है, इस पर सबकी नजर बनी हुई है।