गुमला: महान जननायक बाबा कार्तिक उरांव की जयंती के अवसर पर गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को गुमला प्रखंड के पुग्गु गांव में भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर झारखंड सरकार के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री चमरा लिण्डा ने राज्य संपोषित योजना के तहत लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले वृहद धूमकुड़िया भवन का विधिवत शिलान्यास किया।

इस भवन के निर्माण पर 4 करोड़ 99 लाख 72 हजार 500 रुपये खर्च होने का अनुमान है। मंत्री ने शिलापट्ट का अनावरण कर एवं पूजन संपन्न कर निर्माण कार्य की आधारशिला रखी।

कार्यक्रम में जिला परिषद अध्यक्ष किरण माला बाड़ा, उप विकास आयुक्त अनिमेष रंजन, परियोजना निदेशक आईटीडीए, जिला कल्याण पदाधिकारी सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। समारोह के दौरान सभी गणमान्य अतिथियों ने बाबा कार्तिक उरांव के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

आदिवासी संस्कृति और शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा

प्रस्तावित वृहद धूमकुड़िया भवन को आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और युवाओं के शैक्षणिक विकास को ध्यान में रखकर बहुउद्देशीय स्वरूप में तैयार किया जाएगा। भवन के भूतल पर विशेष प्रशिक्षण हॉल बनाया जाएगा। यहां मांदर, ढोल, नगाड़ा, झांझ और घंट सहित पारंपरिक वाद्ययंत्र उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि नई पीढ़ी पारंपरिक संगीत, गीत और नृत्य कला सीख सके।

भवन के ऊपरी तल पर विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय और कोचिंग सेंटर की व्यवस्था की जाएगी। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं को अध्ययन के लिए बेहतर वातावरण मिलेगा। इसके अलावा सामाजिक कार्यक्रमों और विवाह समारोहों के आयोजन के लिए एक विशाल विवाह हॉल भी बनाया जाएगा।

इस प्रकार धूमकुड़िया भवन आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के साथ-साथ ग्रामीण युवाओं के शैक्षणिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

संस्कृति और परंपराओं को बचाना सामूहिक जिम्मेदारी: चमरा लिण्डा

शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री चमरा लिण्डा ने कहा कि जब हम अपने इतिहास, परंपराओं और संस्कृति को समझते हैं, तब हमें अपनी विरासत के उन महत्वपूर्ण हिस्सों का एहसास होता है, जिन्हें हम पीछे छोड़ चुके हैं। उन्होंने कहा कि अपनी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को दोबारा जीवंत करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए समाज को अपनी परंपराओं से गहराई से जुड़ना होगा।

मंत्री ने चिंता जताई कि आज युवाओं और कॉलेज के विद्यार्थियों में मांदर, नगाड़ा, ढोल, झांझ तथा पारंपरिक लोकगीत-संगीत के प्रति रुचि कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, रीति-रिवाज, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक वाद्ययंत्रों से जुड़ी है। इन परंपराओं को संरक्षित रखना सभी का सामूहिक दायित्व है।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक धूमकुड़िया व्यवस्था केवल एक भवन या स्थान नहीं थी, बल्कि युवाओं को सामाजिक व्यवहार, सांस्कृतिक मूल्यों और सामुदायिक जीवन की सीख देने का माध्यम भी थी। सरकार का प्रयास है कि एक ही परिसर में सांस्कृतिक संरक्षण और शैक्षणिक विकास, दोनों की व्यवस्था की जाए।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी मिलेगी मदद

मंत्री चमरा लिण्डा ने कहा कि एक ओर युवा पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोक संस्कृति को सीखें, वहीं दूसरी ओर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़कर डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनें। उन्होंने कहा कि ग्रामीण प्रतिभाओं को सही मार्गदर्शन, उपयोगी पुस्तकों और अनुभवी लोगों के सहयोग से अपने लक्ष्य तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।

इस दौरान उन्होंने उप विकास आयुक्त अनिमेष रंजन जैसे अधिकारियों के परिश्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उचित मार्गदर्शन की अहम भूमिका होती है। उन्होंने भवन तक सुगम आवागमन सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित रास्ते को खुला रखने का आग्रह भी किया।

निर्धारित समय पर निर्माण पूरा करने का भरोसा

समारोह में उपस्थित प्रशासनिक अधिकारियों ने भवन का निर्माण गुणवत्तापूर्ण तरीके से और निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूरा कराने का भरोसा दिलाया।

बाबा कार्तिक उरांव की जयंती पर किए गए इस शिलान्यास को आदिवासी संस्कृति के संरक्षण, पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा देने और ग्रामीण विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।