झारखंड में BJP का ‘फोर प्वाइंट प्लान’! SIR, स्टूडेंट, परिसीमन और कुड़मी के सहारे हेमंत सरकार को घेरने की रणनीति?
रांची: झारखंड की राजनीति में आने वाले दिनों में सियासी टकराव और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। विपक्षी भाजपा की रणनीति को देखें तो पार्टी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झामुमो नेतृत्व वाली सरकार को एक नहीं, बल्कि कई मोर्चों पर घेरने की तैयारी में दिखाई दे रही है। इसके केंद्र में चार बड़े मुद्दे हैं—SIR, स्टूडेंट पॉलिटिक्स, परिसीमन और कुड़मी समाज। यानी भाजपा का फोकस सिर्फ विधानसभा के भीतर सरकार को घेरने तक सीमित नहीं है। पार्टी ऐसे मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है, जिनका सीधा संबंध मतदाता सूची, युवाओं, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरणों से है। झारखंड में SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर भाजपा लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी की कोशिश है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी, असामान्य बढ़ोतरी और पात्र-अपात्र मतदाताओं के मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जाए। यह मुद्दा भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची से जुड़ा सवाल सीधे चुनावी राजनीति से जुड़ता है। ऐसे में SIR के बहाने भाजपा सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकती है। JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर छात्रों में लंबे समय से नाराजगी और असंतोष के मुद्दे सामने आते रहे हैं। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने जैसे मामलों को भाजपा लगातार उठा रही है। युवा और छात्र वर्ग चुनावी राजनीति में बड़ा प्रभाव रखता है। ऐसे में भर्ती परीक्षाओं का मुद्दा भाजपा के लिए सरकार को घेरने का एक मजबूत हथियार बन सकता है। छात्रों का सवाल जितना बड़ा होगा, सरकार पर राजनीतिक दबाव उतना ही बढ़ेगा—भाजपा की रणनीति का एक अहम हिस्सा यही नजर आता है। परिसीमन भी आने वाले समय में झारखंड की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के संभावित पुनर्गठन का सवाल सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय समीकरणों से जुड़ा है। किस क्षेत्र की राजनीतिक ताकत बढ़ेगी, किस क्षेत्र का प्रभाव बदलेगा और सामाजिक समीकरणों पर इसका क्या असर पड़ेगा—इन सवालों को लेकर राजनीतिक दल अभी से अपनी रणनीति बनाने में जुट सकते हैं। भाजपा के लिए परिसीमन का मुद्दा सिर्फ सीटों की संख्या का सवाल नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावी भूगोल से जुड़ा मुद्दा है। भाजपा की रणनीति का चौथा और बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा कुड़मी समाज को लेकर दिखाई दे रहा है। 20 सितंबर को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में कुड़मी समाज के बड़े कार्यक्रम की चर्चा है। इस कार्यक्रम में बंगाल, ओडिशा और असम के मुख्यमंत्रियों के शामिल होने की बात सामने आई है। अगर तीन राज्यों के मुख्यमंत्री एक मंच पर कुड़मी समाज के कार्यक्रम में पहुंचते हैं, तो इसका राजनीतिक संदेश झारखंड तक भी पहुंचना स्वाभाविक है। झारखंड की राजनीति में कुड़मी समाज का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इस समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करना किसी भी दल के लिए रणनीतिक रूप से अहम हो सकता है। पुरुलिया में प्रस्तावित कार्यक्रम को केवल सामाजिक आयोजन मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम के मुख्यमंत्रियों की संभावित मौजूदगी इसे व्यापक राजनीतिक महत्व दे सकती है। इसका एक संदेश यह भी हो सकता है कि कुड़मी समाज को लेकर झारखंड समेत पूर्वी भारत के राज्यों में राजनीतिक संवाद को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि, कार्यक्रम में नेताओं की मौजूदगी अपने आप में किसी चुनावी गठजोड़ या राजनीतिक रणनीति की अंतिम पुष्टि नहीं करती। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक समूहों के साथ संवाद और संपर्क बढ़ाना चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इन चारों मुद्दों को एक साथ देखें तो भाजपा की रणनीति का संभावित लक्ष्य साफ दिखाई देता है—हेमंत सोरेन सरकार को चार अलग-अलग मोर्चों पर लगातार राजनीतिक दबाव में रखना। यानी भाजपा सरकार को केवल विधानसभा के भीतर नहीं, बल्कि सड़क, छात्र राजनीति, सामाजिक संगठनों और चुनावी विमर्श के स्तर पर घेरने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने चुनौती यह है कि इन सभी मुद्दों का जवाब अलग-अलग स्तर पर देना होगा। SIR का जवाब प्रशासनिक और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा होगा, छात्रों के सवाल का संबंध भर्ती और रोजगार से होगा, परिसीमन का मुद्दा संवेदनशील राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है और कुड़मी समाज का सवाल सीधे सामाजिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि भाजपा के इस ‘फोर प्वाइंट प्लान’ को महज चार अलग-अलग मुद्दों की सूची के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक व्यापक राजनीतिक रणनीति की संभावना दिखाई देती है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इन मुद्दों को कितनी मजबूती से जमीन पर उतार पाती है और हेमंत सोरेन की सरकार इसका राजनीतिक जवाब किस तरह देती है। आने वाले महीनों में झारखंड की राजनीति में ये चारों मुद्दे किस दिशा में जाते हैं, यही तय करेगा कि BJP का यह ‘फोर प्वाइंट प्लान’ महज राजनीतिक रणनीति बनकर रह जाता है या चुनावी समीकरण बदलने वाला अभियान साबित होता है।पहला मोर्चा: SIR के बहाने मतदाता सूची की राजनीति
दूसरा मोर्चा: स्टूडेंट पॉलिटिक्स
तीसरा मोर्चा: परिसीमन की राजनीति
चौथा मोर्चा: कुड़मी समाज पर फोकस
तीन राज्यों के मुख्यमंत्री, एक बड़ा राजनीतिक संदेश?
BJP का असली लक्ष्य क्या?
हेमंत सोरेन के सामने चुनौती कितनी बड़ी?
झारखंड की राजनीति में फिलहाल तस्वीर यह बन रही है कि भाजपा SIR, छात्र, परिसीमन और कुड़मी समाज के मुद्दों को जोड़कर सरकार के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश कर रही है।















