DGP नियुक्ति पर बाबूलाल मरांडी का सरकार पर हमला, बोले- ‘हलफनामे में कहानी नहीं, सुप्रीम कोर्ट को तथ्य चाहिए’
रांची: झारखंड में DGP की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले के बीच नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार के हलफनामे पर तीखा हमला बोला है। मरांडी ने सरकार के जवाब को हास्यास्पद बताते हुए आरोप लगाया कि हलफनामा अपने ही तथ्यों में उलझा हुआ है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बाबूलाल मरांडी ने सवाल उठाया कि सरकार एक ओर कहती है कि अजय सिंह ने DGP बनने में अनिच्छा जताई थी, इसलिए अनुराग गुप्ता को DGP बनाया गया। वहीं, जब चुनाव आयोग ने अजय सिंह को दोबारा DGP बनाया, तो उनकी कथित अनिच्छा आखिर इच्छा में कैसे बदल गई? मरांडी ने यह भी सवाल किया कि चुनाव समाप्त होते ही वही इच्छा फिर क्यों खत्म हो गई? वर्तमान DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सरकार द्वारा दिए गए ‘विकल्पहीनता’ के तर्क पर भी बाबूलाल मरांडी ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में कई वरिष्ठ IPS अधिकारी उपलब्ध थे। इनमें अनिल पालटा, प्रशांत सिंह, एम.एस. भाटिया, संपत मीणा और संजय लाटकर जैसे अधिकारियों के नाम शामिल हैं। ऐसे में सरकार यह स्पष्ट करे कि इन वरिष्ठ अधिकारियों को विकल्प क्यों नहीं माना गया। मरांडी का सवाल है कि यदि वरिष्ठ अधिकारी उपलब्ध थे तो DGP चयन के दौरान उनके नामों पर विचार क्यों नहीं किया गया और वर्तमान नियुक्ति को विकल्पहीनता से क्यों जोड़ा गया? बाबूलाल मरांडी ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा DGP नियुक्ति को लेकर तय व्यवस्था का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार की नियमावली सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के विपरीत है, तो उसकी वैधानिकता भी न्यायिक जांच के दायरे में आनी चाहिए। मरांडी ने कहा कि कोई भी सरकार अपनी नियमावली बनाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। उन्होंने सरकार से DGP नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार के हलफनामे में दिए गए तथ्यों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि जानबूझकर गलत या भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि पिछले पांच DGP की नियुक्तियों से संबंधित पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। इसमें फाइल नोटिंग, अधिकारियों की सहमति-असहमति और DGP चयन के आधार जैसी जानकारियां भी सामने लाने की मांग की गई है। मरांडी ने DGP नियुक्ति के विवाद को झारखंड की खनिज संपदा से भी जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि आरोप यह है कि खनिज संपदा की लूट को संरक्षण देने के लिए पुलिस नेतृत्व की नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की गई। हालांकि, यह आरोप बाबूलाल मरांडी की ओर से लगाए गए हैं। उन्होंने राज्य सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार इन आरोपों को गलत मानती है तो उसे संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर जवाब देना चाहिए। बाबूलाल मरांडी ने कहा कि मामला सिर्फ किसी एक अधिकारी को DGP बनाए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान, कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन से जुड़ा विषय है। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि DGP नियुक्ति से जुड़े मामले में अदालत के सामने स्पष्ट तथ्य रखे जाने चाहिए, न कि ऐसी कहानी पेश की जाए जो खुद सरकार के तथ्यों से उलझ जाए। मरांडी ने कहा कि “हलफनामे में कहानी नहीं, तथ्य चाहिए।” उन्होंने जोर देकर कहा कि DGP की कुर्सी सरकार की पसंद से नहीं, बल्कि संविधान और कानून की मर्यादा के अनुरूप चलनी चाहिए।तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी घेरा
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लेकर उठाया बड़ा सवाल
‘हलफनामे में गलत तथ्य हैं तो जिम्मेदारी तय हो’
खनिज संपदा को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप
‘DGP की कुर्सी सरकार की पसंद से नहीं, कानून से चलेगी’














