वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर आयोजित इफ्तार पार्टी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पवित्र गंगा नदी में मांसाहारी भोजन करना और उसका कचरा या अवशेष फेंकना हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत कर सकता है। अदालत ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं  बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और उत्तर भारत की जीवनरेखा है। यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने चर्चित गंगा इफ्तार विवाद में आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि धार्मिक और सार्वजनिक महत्व वाले स्थानों पर ऐसा कोई भी कार्य नहीं होना चाहिए  जिससे सामाजिक सौहार्द और धार्मिक भावनाएं प्रभावित हों। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि आरोपियों ने अपने हलफनामे में बिना किसी बहाने के अपनी गलती स्वीकार की है और समाज को हुई ठेस के लिए वास्तविक पछतावा व्यक्त किया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जेल में बंद 14 आरोपियों में से 8 मुस्लिम युवकों को जमानत दे दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस द्वारा बाद में जोड़ी गई भारतीय न्याय संहिता BNS की धारा 308  5 यानी जबरन वसूली के आरोपों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि जांच के काफी समय बाद लगाए गए ये आरोप पहली नजर में संदिग्ध और विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी गरीब बुनकर परिवारों से आते हैं  उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वे पिछले दो महीनों से जेल में बंद हैं। ऐसे में उन्हें लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं माना गया। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी धार्मिक आस्था  सार्वजनिक मर्यादा और सामाजिक संतुलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी बहस तेज हो गई है।