भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से श्रद्धा और भक्ति के साथ शुरू हो गई। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर (मौसी घर) के लिए रवाना हुए। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं।

रथयात्रा का धार्मिक महत्व

जगन्नाथ रथयात्रा सनातन परंपरा, समानता और भक्ति का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ हर वर्ष अपने भाई-बहन के साथ भक्तों को दर्शन देने और मौसी के घर जाने के लिए मंदिर से बाहर निकलते हैं। इस दौरान जो श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं, उन्हें विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

रथ की रस्सी खींचने का महत्व

शास्त्रों के अनुसार श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान के रथ की रस्सी खींचने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और भगवान का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति, धर्म, भाषा या वर्ग का कोई भेदभाव नहीं होता। हर श्रद्धालु भगवान के रथ को खींच सकता है।

तीनों रथों की खास पहचान
भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज (लाल और हरा रंग)
देवी सुभद्रा का रथ – दर्पदलन (पद्मरथ) (नीला और काला रंग)
भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदिघोष (गरुड़ध्वज) (लाल और पीला रंग)

हर वर्ष इन रथों का निर्माण विशेष परंपरा के अनुसार नीम की लकड़ी से किया जाता है।

इस बार रवि योग का विशेष संयोग

इस वर्ष रथयात्रा रवि योग के शुभ संयोग में शुरू हुई है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस योग में पूजा, दान, जप और भगवान के दर्शन का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रथ की रस्सी खींचने से सुख-समृद्धि, सफलता और सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद मिलता है।

रथयात्रा का पूरा कार्यक्रम
16 जुलाई: भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की रथयात्रा प्रारंभ
16–23 जुलाई: गुंडिचा मंदिर में प्रवास
24 जुलाई: बहुदा यात्रा (श्रीमंदिर वापसी)
27 जुलाई: नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ रथयात्रा का समापन
आस्था और एकता का महापर्व

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह पर्व सेवा, समानता, भाईचारे और भक्ति का संदेश देता है। भगवान जगन्नाथ का अपने भक्तों के बीच आना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं।