झारखंड ACB में भ्रष्टाचार की 216 जांच लंबित, 43 फाइलें अनुमति के इंतजार में: हाईकोर्ट ने 6 महीने में निपटाने का दिया निर्देश
रांची: झारखंड में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में सैकड़ों प्रारंभिक जांच लंबित होने का मामला सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ACB में कुल 216 प्रारंभिक जांच लंबित हैं। इनमें 43 मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई के लिए फाइलें संबंधित प्राधिकारियों के पास अटकी हुई हैं। वहीं, 173 मामलों में ACB स्तर पर प्रारंभिक जांच जारी है। लंबित मामलों में पांच पूर्व मंत्रियों की कथित आय से अधिक संपत्ति की जांच सहित कई चर्चित मामले शामिल हैं। सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव का कहना है कि उनके द्वारा उठाए गए भ्रष्टाचार से संबंधित करीब 12 मामले भी ACB में लंबित हैं। कुछ दिन पहले झारखंड हाईकोर्ट ने लंबित जांचों को लेकर सख्त रुख अपनाया था। अदालत ने लंबित मामलों का छह महीने के भीतर निष्पादन करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि तय समय-सीमा में जांच पूरी नहीं होने पर देरी के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाएं। रघुवर दास सरकार में मंत्री रहे अमर कुमार बाउरी, रणधीर कुमार सिंह, डॉ. नीरा यादव, नीलकंठ सिंह मुंडा और लुईस मरांडी के खिलाफ कथित आय से अधिक संपत्ति की जांच ACB के चर्चित मामलों में शामिल है। सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने 2014 और 2019 के चुनावी हलफनामों में संपत्ति में कथित वृद्धि को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। 25 जुलाई 2023 को राज्य मंत्रिपरिषद ने पांचों के खिलाफ प्रारंभिक जांच की अनुमति दी थी। अब इस मामले में जांच की प्रगति और निष्कर्ष को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रांची स्थित RINPAS में कथित नियुक्ति अनियमितताओं को लेकर सितंबर 2016 में ACB ने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह, पूर्व मंत्री हेमलाल मुर्मू, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बी.के. त्रिपाठी और संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. अमूल रंजन समेत करीब 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। मामले में नियुक्तियों के दौरान योग्यता संबंधी नियमों की कथित अनदेखी और वेतन वृद्धि में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। हालांकि, मामले की मौजूदा जांच और अदालती स्थिति की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से किया जाना आवश्यक है। गोड्डा जिले की महगामा ग्रामीण जलापूर्ति योजना में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला भी ACB की जांच से जुड़ा रहा है। करीब 1.64 करोड़ रुपये की योजना में लगभग 70 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान का आरोप लगा था। इस मामले में 12 इंजीनियरों और एक ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी। IAS विनय कुमार चौबे के खिलाफ शराब घोटाले और आय से अधिक संपत्ति से जुड़े आरोपों के मामले में नवंबर 2025 में ACB ने प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच के दौरान संपत्ति, बैंक लेन-देन और निवेश की पड़ताल की गई। मार्च 2026 में आरोपपत्र निर्धारित समय में दाखिल नहीं होने के कारण उन्हें डिफॉल्ट बेल मिलने की रिपोर्ट सामने आई थी। इस मामले की वर्तमान स्थिति और आरोपपत्र से संबंधित विवरण की पुष्टि आधिकारिक अभिलेखों से किया जाना जरूरी है। रांची के नामकुम अंचल के डुंडू क्षेत्र में जमीन के दाखिल-खारिज और सरकारी दस्तावेज गायब होने के आरोपों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट के निर्देश पर ACB ने जांच शुरू की थी। शिकायत के अनुसार, एक परिवार की जमीन के हिस्से पर प्रकाश कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड के नाम जमाबंदी खोले जाने का आरोप है। इस मामले में अगस्त 2026 में तत्कालीन अंचलाधिकारी डॉ. श्वेता वर्मा, राजस्व निरीक्षक मनोज कुमार और कार्यालय लिपिक दीपक कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है। मामला कथित अवैध म्यूटेशन और राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़ा है। आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। रांची स्थित RIMS की अधिग्रहित जमीन पर कथित कब्जे और फर्जी दस्तावेजों के जरिए खरीद-बिक्री के मामले में ACB ने जनवरी 2026 में प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच के दौरान मोरहाबादी और कोकर की जमीन से जुड़े मामले सामने आए। मिली जानकारी के अनुसार, अप्रैल में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया और जून 2026 में बिल्डर शुभम साबू की गिरफ्तारी हुई। जुलाई में ACB ने चार आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया। मामले में सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, म्यूटेशन और निर्माण की अनुमति से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच की जा रही है। झारखंड के पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने पहले विधानसभा में ACB की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने एजेंसी के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया था कि कार्रवाई के मामलों में किसी को फंसाने, किसी को दबाने और किसी को बचाने जैसी स्थिति बनती है। यह उनकी ओर से व्यक्त की गई आलोचना थी; एजेंसी की कार्यप्रणाली का आकलन संबंधित मामलों के रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। झारखंड कैबिनेट निगरानी अधिसूचना, 2015 के क्लॉज 21(4)(viii) के तहत प्रारंभिक जांच सामान्य तौर पर 90 दिनों के भीतर पूरी करने का प्रावधान बताया गया है। जांच की अवधि बढ़ाने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कारण दर्ज करना और सक्षम अधिकारी की अनुमति लेना जरूरी है। लंबित जांचों की समय-समय पर समीक्षा का भी प्रावधान बताया गया है। इसके बावजूद कई मामलों में जांच लंबे समय तक लंबित रहने की बात सामने आई है। इससे यह सवाल उठता है कि निर्धारित समय-सीमा का पालन क्यों नहीं हुआ, जांच बढ़ाने के कारण दर्ज किए गए या नहीं और जांच पूरी होने के बाद अनुमति के लिए फाइलें कितने समय तक लंबित रहीं। इन सवालों का जवाब संबंधित मामलों की फाइलों और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही मिल सकता है। भ्रष्टाचार के मामलों में देरी से साक्ष्य प्रभावित होने की आशंका रहती है, वहीं लंबे समय तक जांच लंबित रहने से संबंधित व्यक्तियों के करियर और प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने लंबित जांचों को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय का अधिकार केवल मुकदमे की सुनवाई तक सीमित नहीं है। जांच प्रक्रिया भी उचित समय-सीमा के भीतर पूरी होनी चाहिए। अदालत ने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, गृह सचिव और ACB के महानिदेशक को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। साथ ही आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर लंबित प्रारंभिक जांचों को पूरा करने की समय-सीमा तय की है। जिन मामलों में जांच पूरी होने के बाद सरकार, कैबिनेट या संबंधित विभाग की अनुमति लंबित है, उनमें सक्षम प्राधिकारियों को भी समय पर निर्णय लेना होगा। अब देखना होगा कि अदालत के निर्देश के बाद लंबित जांचों और अनुमति के इंतजार में पड़ी फाइलों पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है।पांच पूर्व मंत्रियों की संपत्ति जांच भी लंबित
RINPAS भर्ती मामला: 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी
महगामा जलापूर्ति योजना में अतिरिक्त भुगतान का आरोप
विनय कुमार चौबे के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला
नामकुम जमीन मामला: राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर
RIMS जमीन घोटाला: फर्जी दस्तावेजों से खरीद-बिक्री का आरोप
विधानसभा में भी उठ चुके हैं ACB की कार्यशैली पर सवाल
प्रारंभिक जांच के लिए 90 दिनों की समय-सीमा
हाईकोर्ट का निर्देश: छह महीने में लंबित जांचों का निपटारा















